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              84.4П  056  Перевод с польского  © 1990 Wydawnictwo Zebra  For the Russian edition © 1992 Wahazar  Перевод © 1992 Мирон Черненко  Фото © 1980 Leopold Dzikowski 

На контртитуле воспроизведена обложка издания:  D. Olbrychski. Wspominki o Wodzimierzu Wysockim.  — Warszawa: Zebra, 1990.  Серия © 1992 Издательство »Вахазар«  Ольбрыхский, Даниэль, 1945 –  88494  Поминая  Владимира  Высоцкого/Пер.  с  польск.  М.Черненко.  —  М.:  Вахазар,  1992.  —  96 с., ил. — (Коллекция польской литературы).  ISBN 5881900049  O 4703010200 D87 03 9 001 03 92 92  От автора  Почему актёр берёт в руки перо?  Может, ему уже нечего играть? Да нет, ещё найдётся пара ролей для работы.  Может  быть,  актёр  хочет  оставить  после  себя  какойто  след  —  яркий,  личный,  не  сотканный из чужих текстов?  Тоже нет. Тогда я пошёл бы против течения собственной жизни. Может, когданибудь  я и возьмусь за это, но, пожалуй, ещё не завтра, наверняка не завтра.  Почему же я написал эту книжечку?  Да  потому,  что  во  множестве  интервью  —  для  газет,  радио,  телевидения  —  я  часто  говорил  о  Владимире  Высоцком.  Из  откликов  слушателей  и  читателей  понял,  что  не  должен держать в себе, хранить для одного себя то, что знаю о нём, что с ним пережил.  Ты  принадлежал  всем,  Володя,  и  они,  я  верю,  хотели  бы  прочитать  и  такую  книгу  о  Тебе.    очему — «поминая»?  Что это такое — поминая?  У православных, когда человек умирает, после похорон бывают поминки. А девятый и  сороковой день тоже отмечают, поминая. По старому русскому обычаю.  Я участвовал в этом обряде после смерти Владимира Высоцкого.  Девятый день я отмечал в Париже, с сёстрами Поляковыми: Мариной Влади, Ольгой и  Элен.  После  службы  в  церкви  мы  отправились  в  странный  дом  странного  эмигранта  брежневской  поры,  художника  Миши  Шемякина,  друга  Володи.  Старая,  огромная  парижская  квартира  против  Лувра.  Пропитанный  атмосферой  и  запахом  старой  России  быт, который напоминает жильё моих друзей в Москве и Ленинграде. Впрочем, где бы я  ни  встречал  даже  самых  новоиспечённых  эмигрантов  из  российской  богемы,  всюду  был  тот же климат, тот же свет, что на русских картинах XIX столетия. И запах — может быть,  мебели  и  икон,  которые  они  привезли  с  собой  или  сразу  же  после  приезда  находили  в  парижских,  римских  и  израильских  антиквариатах.  У  Шемякиных  это  ощущение  дополнялось  картинами  хозяина:  на  стенах  и  мольбертах,  всюду  следы  его  творческой  лихорадки и изобразительно, быть может, ещё более странные работы его молоденькой  дочери.  Ах, меланхолия парижских квартир русских эмигрантов! Я хорошо понимаю это, тем  более, что сам родом с нынешнего восточного пограничья Речи Посполитой. Как Володя, я  знаю эту страшную смесь — даже не скажешь, чего — ностальгии, горечи, поисков самого  П себя,  абсурдного  ощущения  вины:  «Ой,  Данька,  мы  с  тобой  в  Париже  чувствуем  себя,  как  обезьяны  рыжие».  Когда  такое  находило  на  меня,  я  бродил  по  польским  кабакам,  когда  это  происходило  с  Володей,  он  исчезал  вместе  с  Мишей  Шемякиным.  И  хорошо  если только дня на три. А потом — слёзы Марины, многодневное похмелье. И вот цыгане  в «Распутине» — есть такой кабак в Париже — снова становились богаче за счёт тех денег,  которые Володя месяцами копил на очередную машину.  Миша тоже прилично выпивал. Он как раз готовился выехать насовсем в НьюЙорк. А  я возвращался в Польшу, где поднималась волна забастовок. Приближалась августовская  революция.  Эти  первые  поминки  остались  по  сей  день  единственной  встречей  с  Шемякиным.  Как велел обычай, стол был заставлен любимыми разносолами покойного. Лососина,  селёдочка,  икра,  свежие  огурчики  —  всё  из  лучших  армянских  магазинов  Парижа.  На  горячее  —  отменный  украинский  борщ,  вкус  которого  я  помню  до  сих  пор,  ну,  и  беф строганов  с  гречневой  кашей.  И  наконец  —  водочка.  Московская,  столичная,  обросшая  толстым слоем льда.  На  столе  хаос.  Шемякины  не  любят  порядка.  Кроме  них,  Марины  и  её  сестер,  был  Петька — восемнадцатилетний сын Марины, Костя Казанский — гитарист Высоцкого и я с  Зузанной. Во главе стола хозяева оставили пустой прибор, за ним пустое кресло. На стене  гитара и фото покойного. Позаботясь о том, чтоб водки было в достатке, мы вспоминали  только  забавные  случаи  из  Володиной  жизни,  ибо  печали  он,  Боже  сохрани,  не  переносил.  Мы  не  плакали:  успели  выплакаться  в  церкви,  где  —  весь  в  чёрном,  с  тяжкого  похмелья  —  и  тут  я  его  понимал  —  Шемякин  рыдал  в  голос,  что  не  стишком  мешало  торжественной  церемонии,  заглушавшей  его  поразительными  грегорианскими  песнопениями. Впрочем, каждый из нас всхлипывал там потихоньку.  Итак,  почему  «поминая»?  Просто  моя  книжка  —  тоже  своего  рода  поминки  по  мёртвому  другу.  Человеку,  с  которым  я  дружил  больше  десятка  лет,  часто  встречался,  слушал  его  и  любил.  В  сущности,  я  должен  быть  благодарен  судьбе,  позволившей  мне  стать  актёром,  давшей  шанс  добиться  коекаких  успехов,  поездить  по  свету,  познакомиться  с  необыкновенными  людьми.  Среди  них  фигурой,  быть  может,  самой  поразительной был Владимир Высоцкий.  Вторые поминки, сороковины, должны были состояться в Москве. Я обещал Марине,  что приеду обязательно, где бы ни был. Второго сентября я был в Варшаве. В стране после  подписания  Гданьских  соглашений  воцарилась  лихорадочная  атмосфера  радости  и  тревоги: войдут, не войдут?..  А я собирался на одну ночь в Москву…  Мы  познакомились  в  1969 году.  Я  впервые  был  на  Московском  кинофестивале  —  приехал  с  «Паном  Володыевским».  Уже  тогда  я  слышал  о  Высоцком,  прикоснулся  к  его  легенде.  Мы  в  Польше  знали  несколько  его  песен.  Некоторые  из  них  распевали  с  друзьями, просто так, за столом, за рюмкой, зачастую не зная, кто их автор. Одну из них —  «Тот, кто раньше с нею был» — мне напела жена Ежи Гоффмана — Валька.  В тот вечер я не пил, не пел  Я на неё вовсю глядел,  Как смотрят дети, как смотрят дети.  Но тот, кто раньше с нею был,  Сказал мне, чтоб я уходил,  Сказал мне, чтоб я уходил,  Что мне не светит.  И тот, кто раньше с нею был,  Он мне грубил, он мне грозил.  А я всё помню — я был не пьяный.  Когда ж я уходить решил,  Она сказала: «Не спеши!»  Она сказала: «Не спеши,  Ведь слишком рано!».  Но тот, кто раньше с нею был,  Меня, как видно, не забыл, —  И както в осень, и както в осень  Иду с дружком, гляжу — стоят,  Они стояли молча в ряд,  Они стояли молча в ряд —  Их было восемь.  Со мною — нож, решил я: что ж,  Меня так просто не возьмёшь, —  Держитесь, гады! Держитесь, гады!  К чему задаром пропадать,  Ударил первым я тогда,  Ударил первым я тогда —  Так было надо.  Но тот, кто раньше с нею был,  Он эту кашу заварил  Вполне серьёзно, вполне серьёзно.  Мне ктото на плечи повис,  Валюха крикнул: «Берегись!»,  Валюха крикнул: «Берегись!» —  Но было поздно.  За восемь бед — один ответ.  В тюрьме есть тоже лазарет, —  Я там валялся, я там валялся.  Врач резал вдоль и поперёк,  Он мне сказал: «Держись, браток!»,  Он мне сказал: «Держись, браток!» —  И я держался.  Разлука мигом пронеслась,  Она меня не дождалась,  Но я прощаю, её — прощаю.  Её, как водится, простил,  Того ж, кто раньше с нею был,  Того, кто раньше с нею был, —  Не извиняю.  Её, конечно, я простил,  Того ж, кто раньше с нею был,  Того, кто раньше с нею был, —  Я повстречаю!  О том, что это песня Высоцкого, я не имел тогда ни малейшего понятия. Но она мне  очень понравилась, и я попросил Агнешку Осецкую перевести её для меня. Принимаясь за  эту  книжечку,  я  вдруг  понял,  что  из  её  перевода  помню  только  один  куплет  —  наверно,  потому,  что  часто  напевал  его  про  себя  порусски.  Но  через  двадцать  лет  Агнешка  не  сумела разыскать старый перевод, и мы вместе сделали его заново.  Эта песня из цикла «блатных» была моим первым знакомством с поэзией Высоцкого.  До  меня  начинало  доходить,  кто  он  такой  и  что  пишет,  я  уже  научился  узнавать  на  стёртых магнитофонных плёнках его хрипловатый голос.  Мы все слушали тогда эти песни, часто не понимая до конца их текст. Но не это было  главное.  Поэтический  язык  Высоцкого,  мне  кажется,  труднее  для  человека  нерусского,  чем  язык  Окуджавы,  по  которому  моё  поколение  учило  русский.  Именно  по  Окуджаве,  потому  что  в  школе  —  мы  знаем  это  хорошо  —  никто  всерьёз  не  учит  никакой  иностранный  язык  (тем  более  язык,  который  учить  не  подобает).  А  песни  Булата  в  шестидесятых  годах  мы  все  знали  на  память.  Поэт,  считавшийся  не  слишком  благонадёжным  в  собственной  стране,  заставил  тысячи  молодых  поляков  задать  себе  труд, чтобы понять этот прекрасный язык.  Высоцкий тогда ещё не был так известен, слава пришла к нему позже, но ворвалась в  его  жизнь  яростнее.  Песни  Высоцкого  расходились  со  скоростью  урагана.  Копия  плёнки,  записанной  в  субботу  на  частной  московской  квартире,  истёртая  и  почти  неразборчивая  после  многократных  перезаписей,  уже  в  понедельник  доходила  до  Владивостока.  И  какимто ещё более странным образом вскоре попадала к некоторым полякам. Одним из  них был я, и потому, когда я впервые встретился с Высоцким, я сознавал, что прикасаюсь к  легенде.  А было так:  Сидел  я  в  гостинице  «Россия»  со  своим  переводчиком.  Его  ко  мне  приставили  несмотря на то, что я уже неплохо говорил порусски — с ним, кстати, тоже. Такой это был  «переводчик».  Он  знал,  что  я  знаю,  кто  он  такой.  Странно,  но  тогда  этот  ритуал  КГБ  казался  нам  чемто  вполне  нормальным  —  мы  к  нему  привыкли.  Всё  было  настолько  очевидно, что не удивляло, а только вызывало смех.  Как ставшая легендой история, случившаяся в одной из московских гостиниц. Ребята  из какогото польского ансамбля подвыпили и вздумали поговорить по душам. Но потом  решили — справедливо или нет — что в комнате должен быть микрофон. Рьяно взялись  за  поиски.  Однако  поверхностный  осмотр  не  дал  результатов.  Тогда  они  скатали  огромный  ковёр,  лежавший  в  центре  огромной  комнаты.  В  самом  деле,  под  ковром  торчало  нечто,  напомнившее  разгорячённому  сознанию  необыкновенно  изощрённую  подслушивающую аппаратуру. Применив всё, что было под рукой, в том числе ключ для  настройки  гитар,  ребята  лихо  принялись  за  демонтаж.  Когда  винты  были  вывинчены,  раздался  глухой  грохот;

  он  свидетельствовал  о  значительном  весе  люстры,  упавшей  этажом  ниже.  К  счастью,  обошлось  без  человеческих  жертв.  Ну  вот,  мой  симпатяга переводчик говорит:  —  Смотри, кто там идёт! Знаешь этого человека? Это Высоцкий!  И представил нас следующим образом:  —  Даниэль  Ольбрыхский,  польский  актёр.  Владимир  Высоцкий  —  актёр,  певец  и  вообще наша легенда.  —  Очень  приятно,  —  сказал  Высоцкий  своим  жёстким  голосом,  который  в  действительности  был  много  теплее,  чем  тот,  которым  он  пел  свои  песни.  И  мы  разошлись.  Ему  было  тогда,  наверно,  около  тридцати,  мне  двадцать  три.  Он  был  ниже  меня ростом, но ненамного.  Высоцкий  исчез,  а  я  вижу,  мой  переводчик  явно  хочет  сказать  чтото  ещё  более  важное. Отвёл меня в сторону и говорит:  —  Даниэль, то, что я тебе сказал — правда, но это не самое главное. Правда, что он  актёр,  гитарист  и  известный  поэт,  но  это  ерунда!  Он,  —  и  тут  мой  опекун  характерным  образом  огляделся,  как  тогда  вели  себя  русские,  если  намеревались  произнести  нечто  крамольное, — он спит с Мариной Влади!  Решил,  что  это  самая  важная  информация  о  Высоцком,  которую  мне  надлежит  непременно сообщить!  Я  привожу  этот  случай  не  как  хамский  анекдот.  Сама  Марина  любит  эту  историю  и  часто меня просит её рассказать разным знакомым. И есть в этом какаято красота, нечто  от вечного обаяния жизни и смерти…  огда  Высоцкий  познакомился  с  Мариной  Влади,  она  считалась  в  СССР  звездой  абсолютно  первой  величины.  На  рубеже  пятидесятых  и  шестидесятых  годов,  наряду  с  Брижит  Бардо  она  была,  пожалуй,  самой  знаменитой  молодой  кинозвездой  Европы. Добавим к этому чисто русское происхождение, и станет ясно, что любви русских  не  следует  удивляться.  Её  отец,  лётчик  Владимир  Поляков,  накануне  первой  мировой  войны  выехал  во  Францию  за  самолётами  для  русской  армии.  Война  застала  его  в  Париже.  Драматические  известия  из  России,  революция,  гражданская  война,  большевистская власть склонили его к эмиграции. Во  Франции же родились его дочери.  Артистический псевдоним Марины — это сокращённое имя отца.  Первая встреча Марины и Володи — так рассказывали мне много позже — произошла  следующим образом. Её привели в Театр на Таганке. Он играл там одну из главных ролей  в пьесе о Пугачёве, поставленной Юрием Любимовым. Марина была покорена обаянием,  силой актёрской игры и личности Высоцкого. Потом был ужин в Доме Актёра.  Я  могу  себе  представить,  благо  не  раз  бывал  там,  эту  горячую  атмосферу,  которая  возникает, когда русские коллеги принимают гостей. Несравненная сердечность, широкий  жест  (особенно  если  сопоставить  баснословные  счета  со  ставками,  по  которым  там  оплачиваются  и  сегодня  самые  выдающиеся  актёры),  переходы  от  столика  к  столику,  которым  предшествует  посланная  через  официанта  бутылка  шампанского…  Так  это,  должно быть, выглядело, когда против Марины сел Владимир Высоцкий.  Ты рассказывала мне, что по сравнению со своим сценическим героем он показался  тебе  и  меньше  ростом,  и  уже  в  плечах,  и  какимто  уставшим.  И,  помнишь,  Маринка,  только его серые глаза вглядывались в тебя с необыкновенной силой?  В  этом  дымном,  разгорячённом,  веселящемся  зале  состоялось  прекраснейшее,  глубочайшее признание в любви: что он ждал этой встречи с той минуты, когда впервые  увидел  её  в  кино…  что  решил  —  если  встретит,  то  это  будет  женщина  его  жизни…  что  любит. И так это началось.  Мне кажется, если бы не Марина и любовь к ней, Володя мог бы покинуть наш мир  много  раньше.  Благодаря  этой  любви  он  порой  притормаживал  безумный  темп  своей  жизни,  и,  может  быть,  прожил  больше  лет,  чем  было  суждено  изначально.  Когда  они  встретились, он был уже очень больным человеком. И именно она, Марина, давала ему  силу,  смысл  жизни,  желание  петь  и  любить.  А  проще  —  жить:  идти  по  «Натянутому  канату».  Он не вышел ни званьем, ни ростом.  Не за славу, не за плату  К На свой, необычный манер  Он по жизни шагал над помостом  По канату, по канату,  Натянутому, как нерв.  Посмотрите — вот он  без страховки идёт.  Чуть правее наклон —  упадёт, пропадёт!  Чуть левее наклон —  все равно не спасти…  Но должно быть, ему очень нужно пройти  четыре четверти пути.  И лучи его с шага сбивали,  И кололи, словно лавры.  Труба надрывалась — как две.  Крики «Браво!» его оглушали,  А литавры, а литавры —  Как обухом по голове!  Посмотрите — вот он  без страховки идёт.  Чуть правее наклон —  упадёт, пропадёт!  Чуть левее наклон —  всё равно не спасти…  Но теперь ему меньше осталось пройти —  уже три четверти пути.  «Ах как жутко, как смело, как мило!  Бой со смертью — три минуты!» —  Раскрыв в ожидании рты,  Из партера глядели уныло —  Лилипуты, лилипуты —  Казалось ему с высоты.  Посмотрите — вот он  без страховки идёт.  Чуть правее наклон —  упадёт, пропадёт!  Чуть левее наклон —  всё равно не спасти…  Но спокойно, — ему остается пройти  всего две четверти пути!  Он смеялся над славою бренной,  Но хотел быть только первым —  Такого попробуй угробь!  Не по проволоке над ареной, —  Он по нервам — нам по нервам —  Шёл под барабанную дробь!  Посмотрите — вот он  без страховки идёт.  Чуть правее наклон —  упадёт, пропадёт!  Чуть левее наклон —  всё равно не спасти…  Но замрите, — ему остается пройти  не больше четверти пути!  Закричал дрессировщик — и звери  Клали лапы на носилки…  Но прост приговор и суров:  Был растерян он или уверен —  Но в опилки, но в опилки  Он пролил досаду и кровь!  И сегодня другой  без страховки идёт.  Тонкий шнур под ногой —  упадёт, пропадёт!  Вправо, влево наклон —  и его не спасти…  Но зачемто ему тоже нужно пройти  четыре четверти пути!  Эту  песню  Володя  написал  о  себе.  Но  мне  не  хватает  в  ней  Марины.  Хорошо,  что  существуют  женщины,  которые  ходят  под  канатами,  где  балансируют  их  избранники.  Мужчины, которые ведут себя с решимостью Володи или с мудростью и упрямством пана  Когито  из  стихов  Збигнева  Херберта,  с  обаянием,  самозабвением,  глупостью,  но  всегда  талантливо.  Есть  женщины,  которые  заботятся,  посылают  самые  добрые  флюиды  и,  кажется,  готовы  сами  служить  сеткой  безопасности.  Однако  всё  это  изматывает  и  в  конечном  счёте  оказывается  бессмысленным  и  бесчеловечным.  И  тогда  ловкие  тела  канатоходцев  падают  вниз,  а  женщины,  чтобы  не  погибнуть,  вынуждены  сойти  с  линии  падения,  ибо  их  «подобные  птицам»  избранники  легко  взмывают  ввысь,  но  земное  притяжение влечёт их к себе куда сильнее.  Сейчас,  прочитав  книгу  Марины,  я  узнал,  что  первое  рукопожатие,  которым  мы  обменялись  с  Высоцким  в  «России»,  произошло  незадолго  до  того,  как  он  —  тоже  впервые  —  оказался  на  грани  смерти.  Володя  торопился  к  автобусу,  стоящему  у  гостиницы:  звёзды  Московского  кинофестиваля  должны  были  отправиться  на  какойто  официальный приём. Марина Влади уже сидела в автобусе, и Володя вошёл в салон, не  подумав,  что  он,  живая  легенда  своей  страны,  для  вышколенного  шофёра  остаётся  простым россиянином. А автобус предназначался для «иностранцев»…  На  глазах  Марины  и  других  гостей  его  грубо  выпроводили  из  автобуса.  Через  окно  Марина увидела, как он, в бешенстве от унижения, пинает какуюто коробку и исчезает за  углом.  После  приёма,  прочёл  я  в  книге  Марины,  гости  отправились  на  квартиру  одного  из  актёров, приятеля Володи. Высоцкий появился там после полуночи, совершенно пьяный.  Его  стало  рвать  кровью,  вызвали  скорую  помощь,  врач  диагностировал  агональное  состояние и, не желая портить себе статистику, отказался везти его в больницу.  Почти  наверняка  именно  тогда  Марина  Влади  впервые  спасла  ему  жизнь.  Ярость  женщины,  борющейся  за  своего  любимого,  вынудила  санитаров  забрать  Володю.  А  в  больнице  за  ним  уже  ухаживали  великолепно.  Реанимация,  операция  (у  него  лопнул  кровеносный  сосуд  в  горле)  и  очень  долгая  реабилитация.  Спустя  много,  много  дней  он  начал приходить в себя и даже понемножку петь больным и больничному персоналу.          иктор  Ворошильский  употребил  однажды  формулу:  «люди  натянутой  струны».  В  самом  деле.  Володя  наверняка  принял  бы  это  название.  Как  и  многие  другие  великие артисты, он носил в себе какойто инстинкт самоуничтожения. Долгое время я не  отдавал себе отчёта в пороках Высоцкого. Я не видел, и Марина знает, что это правда, я  никогда  не  видел  его  пьяным.  В  начале  нашего  знакомства  я  поверил,  что  он  окончательно  бросил  пить.  Оба  они  держали  меня  в  блаженном  неведении:  «Ни  капли  алкоголя.  Может,  когданибудь,  Маринка,  когда  нам  будет  лет  по  сорок  и  мы  будем  стары,  мы  выпьем  по  капле  красного  вина  у  Чёрного  моря».  Только  из  книги  Марины  я  узнал об их драме.  Году,  наверно,  в  семьдесят  четвёртом  коллега  рассказал  мне,  что  видел  в  Вильнюсе  смертельно пьяного Высоцкого. Я позвонил Володе в Москву и повторил услышанное. Он  спокойно спросил:  —  Кто тебе об этом сказал?  —  Мой приятель, — ответил я.  —  Значит, он неприятель.  Мне кажется, не лгал ни тот, ни другой.

 Только теперь я узнал, что Володя, точно, там  запил.  Но  он  не  хотел  признаться,  ему,  должно  быть,  было  стыдно.  Он  вывернулся,  объяснив,  что  сплетник  не  может  быть  настоящим  другом.  Тогда  я  поверил  —  я  был,  пожалуй,  единственным  человеком,  который  свято  верил  в  Высоцкоготрезвенника,  и  Володя не хотел терять такого человека. Я рад, что ему была так важна именно моя вера в  его силы.  Происшествие, о котором я сейчас расскажу, не могло эту веру не подорвать.  Дело  было  в  Париже,  в  доме  на  улице  Дюрок.  Прихожу,  Марина  знаком  велит  мне  войти в спальню. Вхожу, вижу Высоцкого, который увлечённо и в полной неподвижности  смотрит  фильм.  Это  Феллини,  «Три  шага  в  пустоту».  Пересказывать  фабулу  нет  смысла,  поскольку  она,  как  обычно  у  этого  режиссёра,  отсутствует.  Кинозвезда  приезжает  на  съёмки фильма в Рим. Герой молод, знаменит, богат и, тем не менее, постоянно кудато  убегает — он и наркоман, и алкоголик одновременно. Вместо того чтобы отправиться на  площадку,  он  садится  в  спортивную  машину  и  кудато  мчится.  Возникает  калейдоскоп  какихто картин.  Я никогда не употреблял наркотики, и потому не знаю, какие видения они вызывают.  Говорят,  эти  видения  сказочно  красивы.  На  экране  во  время  безумной  гонки  героя  сменялись  краски  и  цвета.  Наконец  он  въехал  в  какойто  бесконечный  туннель.  Признаюсь,  меня  это  занимало  не  слишком.  Впрочем,  я  же  видел  фильм  не  с  начала.  В  какоето мгновение я стал наблюдать исключительно за Высоцким. А он смотрел на экран,  как кролик, загипнотизированный удавом, словно вглядываясь в нечто страшное и в то же  время притягательное. Вдруг открылась дверь и Марина сказала: «Чай ждёт». Высоцкий  тяжело поднялся и, увидев меня, произнёс: «Браток, это наша судьба».  Чай был подан с великолепным вареньем.  В Это  был  первый  сигнал,  который  я  тогда  оставил  без  внимания.  Потом  прозвучали  другие,  пока  не  пришло,  наконец,  время,  когда  уже  нельзя  было  притворяться.  Париж,  конец  семидесятых.  Володю  ждут  три  сольных  концерта  на  Монмартре.  Утром,  в  день  первого  концерта,  зашёл  я  в  их  квартирку  на  Дюрок.  Открыла  Марина,  бледная,  заплаканная.  Я  почувствовал  характерный  запах  лекарств.  Из  спальни  слышался  голос,  который напоминал Володю, пародирующего алкоголиков в своих песнях. Оттуда вышел  человек. Я понимаю — доктор. Говорит Марине чтото об эсперале. Малопомалу до меня  доходит. Так и есть: многодневный запой. Марина уже не притворяется. Входим к Володе.  Он  лежит,  бледнозелёный,  весь  в  поту.  Таким  я  увижу  его  потом,  после  «Гамлета»  в  Варшаве.  Пытается  чтото  сказать,  но  не  в  состоянии  выговорить  ни  слова.  Мышцы  губ,  голосовые связки и горло, его легендарный голос  — эта «тройка коней», ковёрсамолёт,  ракета «земля — воздух» — не функционируют. А вечером концерт! Билеты проданы!  Он  преодолел  это…  Ещё  раз.  Но  какой  ценой…  Я  был  при  этом,  видел.  Марина,  стоявшая в глубине сцены, за ансамблем, переводила публике тексты песен, которые пел  Володя.  Я  и  её  сын  Петька  знаем:  Марина  сегодня  не  столько  взволнована,  сколько  издёргана. Да и мы тоже.  Потом был ужин у её сестры Одиль, в особняке на улице Юниверсите, в самом центре  города. Одиль это Таня, одна из «Трёх сестёр» в знаменитой постановке чеховской драмы  в Париже. Одиль, прекрасная, чудесная Одиль умрёт от рака за месяц до Володи.  Скромный ужин в скромном особнячке. Володя не пьёт, ест мало. Он очень устал. Я  осмеливаюсь  затронуть  эту  тему.  Говорю  ему,  как  мне  кажется,  нечто  очень  важное:  «Послушай,  так  нельзя,  тебе  нельзя.  Ты  принадлежишь  не  только  себе,  даже  не  только  России, ты сокровище всего славянства. Я, поляк, не хочу, не позволю тебе погубить себя».  Я сам почувствовал себя чуть выпившим. Володя трезв, смотрит на меня с жалостью, а я  чтото бормочу сквозь слёзы. Может, и благородно, но — глупо.  К тому же он не оченьто меня слушает, и я начинаю с другой ноты: «Слушай, ты это  неудачно  придумал.  Твой  любимый  Пушкин,  Лермонтов…  пистолет  в  руке…  ладно,  в  порядке!..  Есенин,  Маяковский…  самоубийство.  Совсем  молодые,  всё  та  же  романтическая  легенда.  Ты  слишком  стар  для  этого.  Тебе  подобает  достойно  и  мудро  состариться,  как  Толстому,  а  не  дурить  и  допиться  до  смерти».  Володя  незаметно  улыбнулся и посмотрел на меня отсутствующим взглядом.  Прошли годы. Я уже всё знаю. У него не было тяги к самоубийству. Натянутая струна  вовсе  не  в  том,  чтобы  лихо  покончить  с  собой,  но  в  том,  чтобы  на  мгновение,  в  творческие,  волнующие  моменты  жизни,  забыть  о  существовании  смерти.  Забыть  о  ней,  то есть словно бы получить прямо от неба мощный импульс отваги и жизненной энергии.  Окуджаве  хватило  лишь  нескольких  слов,  чтобы  обрисовать  Высоцкого  с  его  безумным  бегом  по  жизни,  с  его  здоровым,  щенячьим  легкомыслием.  Недавно  я  попросил Булата:  —  Я пишу воспоминания. Скажи мне, дорогой, чтонибудь о Володе.  Я знаю, Булат не любит, когда его спрашивают о Высоцком, но на меня он, надеюсь,  не  обиделся.  Он  хорошо  знает,  как  и  я,  что  в  жизни  живые  всегда  правы  перед  лицом  мёртвых, а в поэзии, в искусстве — наоборот. Он взглянул на меня посвоему:  —  Знаешь,  —  сказал  он,  —  мы  были  мало  знакомы.  Он  любил  компании,  любил  выпить. Я пью мало, люблю быть один… Последний раз я видел Володю в середине июля  восьмидесятого  года.  Я  ехал  по  улице  Горького.  Ктото  мчится.  Смотрю,  меня  обгоняет  Володя в своём «мерседесе», улыбается. Помахал мне, обогнал и исчез. Вот… А потом, —  продолжал Булат, — мы поехали с Олей на экскурсию по Чёрному морю. На корабле мы  получили  ту  же  каюту,  которую  чуть  раньше  занимали  Володя  с  Мариной.  И  там,  в  этой  каюте, по радио услышали, что он умер. Вот…  Это всё, что сказал мне поэт о поэте. Этого было достаточно. Я ничего в этом ответе не  хочу приукрашивать, Булат знает что говорит, он чувствует фразу. Уточнения ради я хотел  бы  добавить,  что  великий  Булат,  художник  совершенно  иного  темперамента,  чем  Высоцкий,  ценил  своего  младшего  собрата  и  при  жизни  сделал  ему  много  хорошего.  А  тогда, чтобы публично говорить о нём хорошо, нужно было обладать не только вкусом, но  и отвагой.  олодя  довольно  поздно  начал  путешествовать  по  свету,  концертировать  за  рубежом.  Но  именно  эти  поездки  позволяли  ему  перевести  дух,  затосковать  —  даже и по тому, что он ненавидел на своей родине. Ибо есть такая тоска — по тому, что  ненавидишь  в  самом  себе  или  в  своей  стране.  Иные  художники  без  этого  ощущения  просто гибнут. И кто знает, быть может, эта борьба с постоянно отрастающими головами  гидры или с ветряными мельницами так и должна длиться без конца.  Заграничные  поездки  Высоцкого  стали  возможны  лишь  после  того,  как  президент  Франции Помпиду побывал в СССР и Марина упросила кого следует — в своей книге она  описывает эти драматические усилия, — чтобы её мужу разрешили выезжать за границу.  С тех пор он часто ездил в Париж, к Марине.  Как и я, он не любил летать самолётом. И очень любил водить машину. Как известно,  путь из Москвы в Париж ведёт через нашу страну. Володя очень любил Польшу. Больше  чем  любил.  В  его  любви  к  Польше  было  чтото  от  глубокого  восхищения,  изумления.  Я  знаю  точно,  это  была  не  просто  вежливость.  Поклонникам  Высоцкого  известна  анкета,  которую он заполнил ещё весьма молодым человеком. На вопрос, какую страну он любит  более всего — разумеется, после России, любимой отчизны, — он без колебаний ответил:  Польшу. Среди композиторов самым близким он считал Шопена.  Знаешь, Маринка, внимательный слушатель найдёт в его песнях немало намеренных  полонизмов  и  польских  реалий.  Ты  рассказывала  мне,  как  Володя  впервые  приехал  в  Варшаву…  Они  рассчитывали  провести  у  меня  день  или  два  и  ехать  дальше.  Но  несколько  запоздали, заблудились. Случайно выбрались к СилезскоДомбровскому мосту и должны  были пересечь Вислу в том месте, с которого открывается самый прекрасный вид на Старе  Място.  Володя  остановился,  вышел  из  машины,  сошёл  вниз,  на  пляж.  Очень  долго  смотрел на Старувку…  Он  многое  знал  о  Варшавском  восстании,  о  его  трагической  судьбе.  Слышал,  что  по  приказу  Сталина  наступление  было  остановлено,  чтобы  восстание  обескровилось,  чтобы  погибли  те,  кто  хотел  сказать  миру:  «Мы  освободили  собственную  столицу,  мы  имеем  право решать судьбу нашей страны». Когдато Володя сказал мне с наивностью ребёнка:  «Я знаю всё, даже о пакте “Риббентроп — Молотов”…».  Он долго смотрел на Старе Място, и на клочке бумаги начал чтото записывать. Там,  на  пляже.  Когда  они  добрались  до  меня  —  я  жил  тогда  на  улице  Драгунов,  рядом  с  Лазенковским парком  — он прямо с порога  объявил: «Я начал писать песню». Это были  «Дороги… дороги…»  Ах, дороги узкие —  Вкось, наперерез, —  Вёрсты белорусские —  С ухабами и без!  Как орехи грецкие  Щёлкаю я их, —  Говорят, немецкие —  В  Гладко, напрямик…  Там, говорят, дороги — ряда по три  И нет дощечек с «Ахтунг!» или «Хальт!».  Ну что же — мы прокатимся, посмотрим,  Понюхаем — не порох, а асфальт.  Горочки пологие —  Я их щёлк да щёлк!  Но в душе, как в логове,  Затаился волк.  Ату, колёса гончие!  Целюсь под обрез —  С волком этим кончу я  На отметке «Брест».  Я там напьюсь водички из колодца  И покажу отметки в паспортах.  Потом мне пограничник улыбнётся,  Узнав, должно быть, или — просто так…  После всякой зауми  Вроде «кто таков?» —  Как взвились шлагбаумы  Вверх, до облаков!  Взял товарищ в кителе  Снимок для жены —  И… только нас и видели  С нашей стороны!  Я попаду в Париж, в Варшаву, в Ниццу!  Они — рукой подать — наискосок…  Так я впервые пересёк границу —  И чьито там сомнения пресёк.  Ах, дороги скользкие —  Вот и ваш черёд, —  Деревеньки польские —  Стрелочки вперёд;

  Телеги под навесами,  Булыжникчешуя…  Попольски ни бельмеса мы —  Ни жена, ни я!  Потосковав о ломте, о стакане,  Остановились гдето наугад,  И я сказал порусски: «Прошу, пани!» —  И получилось точно и впопад!  Ах, еда дорожная  Из немногих блюд!  Ем неосторожно я  Всё, что подают.  Напоследок — сладкое,  Стало быть — кончай!  И на их хербатку я  Дую, как на чай.  А панночка пощёлкала на счётах  (Всё как у нас — зачем туристы врут!)  И я, прикинув разницу валют,  Ей отсчитал не помню сколько злотых  И проворчал: «Побожески дерут»…  Где же песниздравицы, —  Нука подавай! —  Польские красавицы,  Для туристов — рай?  Рядом на поляночке —  Души нараспах —  Веселились панночки  С граблями в руках.  «Да, побывала Польша в самом пекле, —  Сказал старик — и лошадей распряг… —  Красавицы полячки не поблекли —  А сгинули в немецких лагерях…»  Лемеха въедаются  В землю, как каблук,  Пеплы попадаются  До сих пор под плуг.  Память вдруг разрытая —  Неживой укор:  Жизни недожатые —  Для колосьев корм.  В мозгу моём, который вдруг сдавило  Как обручем, — но так его, дави! —  Варшавское восстание кровило,  Захлёбываясь в собственной крови…  Дрались — худобедно ли,  А наши корпуса —  В пригороде медлили  Целых два часа.  В маршбросок, в атаку ли —  Рвались как один, —  И танкисты плакали  На броню машин…  Военный эпизод — давно преданье,  В историю ушёл, порос быльём, —  Но не забыто это опозданье,  Коль скоро мы заспорили о нём.  Почему же медлили  Наши корпуса?  Почему обедали  Эти два часа?  Потому что танками,  Мокрыми от слёз,  Англичанам с янками  Мы утёрли нос!  А может быть, разведка оплошала —  Не доложила?.. Что теперь гадать!  Но вот сейчас читаю я: «Варшава» —  И еду, и хочу не опоздать!   вы не опоздали, Маринка.  А  потом  была  прогулка  по  Лазенкам,  Старе  Място  и  урна  с  дарами  на  восстановление  Королевского  Замка.  С  удивительной  простотой  и  естественностью  он,  русский  поэт,  опустил  пачку  банкнот.  Ты,  французская  звезда,  фамильный  перстень.  Да,  да, я помню…  Володя  не  расставался  со  своей  гитарой.  Но  однажды,  к  моему  удивлению,  он  приехал  в  Польшу  без  неё.  Оказалось,  что  на  границе  советский  таможенник  заявил:  «Высоцкий,  ваша  гитара  нам  слишком  дорога».  И  ему  пришлось  оставить  её  в  камере  хранения!  Надо  полагать,  чиновник  не  мог  позволить  Высоцкому  гдето  там,  неизвестно  для  кого,  концертировать.  Вероятно,  он  предположил,  что  если  его  начальство  узнает  о  какомто  нелегальном  концерте  в  дружественной  Польше,  то  ему,  таможеннику,  будет  вменена в заслугу попытка этому воспрепятствовать, не выпустив за границу знаменитую  семиструнку  Высоцкого.  Впрочем,  один  Бог  знает,  о  чём  думал  этот  человек.  А  может  быть, он так любил эту гитару и она столько для него значила, что он просто боялся, как  бы Володя гденибудь по дороге не сломал её или не потерял.  Разумеется,  мы  немедленно  нашли  Высоцкому  другую  гитару.  Правда,  шестиструнную,  но  всётаки.  Володю  не  нужно  было  долго  уговаривать,  импровизированный концерт состоялся в отеле «Мазовецкий», в Лодзи.  Лодзь лежит в стороне от трассы Варшава— Свецко. Но в Варшаве Володя с Мариной  узнали, что я на съёмках в Лодзи. Поначалу они не собирались навещать меня, ведь они  торопились, но, увидев за Ловичем, в наступающей темноте, дорожный знак с надписью  «Лодзь  —  50 км»,  решили  всётаки  наведаться.  И  правильно  сделали!  Выяснилось,  что  они сэкономили тысячу километров;

 у портье в «Мазовецком» оказалось, что они забыли  в Варшаве свои паспорта. Назавтра паспорта привезла Малгожата Браунек, приехавшая в  Лодзь на перезапись «Потопа».  Вечером  собралась  небольшая  кинематографическая  компания.  Были  Казимеж  Куц,  Ежи  Гоффман,  Януш  Маевский,  Малгося  Потоцкая.  Высоцкого  не  пришлось  долго  уговаривать,  достаточно  было  сказать:  «Володя,  спой».  Он  настраивал  гитару,  откашливался, гасил сигарету — а курил он много, крепкие, американские. И начинал…  И  не часто видел слёзы на глазах у мужчин.  На концертах Высоцкого это случалось всегда. И у всех нас бегали мурашки по  спине. Это было нечто необыкновенное.  Чаще  всего  я  слышал,  как  он  пел  для  поляков.  Он  отдавал  себе  отчёт  в  том,  что  мы  понимаем не все слова, и потому перед каждой песней рассказывал, о чём будет петь. Так  было и тогда, когда я привёл к нему весь Национальный театр во время наших гастролей в  Москве.  Мы  пришли  на  Малую  Грузинскую,  где  жил  Володя.  Он  приготовил  для  нас  великолепный,  щедро  заставленный  стол:  лососина,  икра,  грибы,  водка…  На  этот  раз  не  было Марины и провианта от парижских армян. Москва не Париж: даже Высоцкий, перед  которым распахивались двери всех магазинов и ресторанов (я думаю, он и представить не  мог,  что  для  него  не  найдётся,  скажем,  осетрины  или  свободного  столика),  потратил  целый день на подготовку такого приёма.  Он  был  гостеприимен,  как  только  русские  умеют.  Любил  принимать  гостей,  любил,  чтобы люди встречались у него дома, ели, пили, веселились, чувствовали себя свободно.  В эти мгновения он бывал в своей стихии и пел охотнее всего. В тот вечер, кроме труппы  нашего театра, была здесь моя спутница, Марыля Родович, которую Володя очень ценил.  Вот  видишь,  Маринка,  Володе  довелось  на  протяжении  нескольких  лет  познакомиться  с  тремя  спутницами  жизни  своего  приятеля,  мне  же  выпало  счастье  познакомиться только с тобой. В третий раз ты была подругой невесты на нашей свадьбе в  Париже в 1978. Кажется, я хотел продемонстрировать вам тогда, что никаких других уже  не  будет.  Между  тем,  всего  парой  лет  раньше,  на  Малой  Грузинской,  рядом  со  мной  сидела  Марыля,  которая  думала,  наверно,  что  ни  с  ней,  ни  со  мной  последующих  не  будет.  В числе гостей я помню ещё Никиту Михалкова, режиссёра, соседа Володи. Впрочем,  весь  дом  на  Малой  Грузинской  населён  артистическим  истеблишментом  Москвы:  актёрами, художниками, писателями.  Квартира  Володи  состояла  из  небольшой,  современно  обставленной  гостиной,  уютной  спальни  с  широким  ложем  и  маленького  кабинета,  заставленного  антикварной  мебелью.  И  небольшой  кухни,  похожей  на  кухни  в  польских  блочных  домах.  Повсюду  была видна рука отсутствующей Марины, везде царил образцовый порядок. Я полагаю, в  этом  была  заслуга  и  мамы  Володи.  Что  касается  меня,  то  без  постоянного  надзора  женщины, которая, прилагая титанические усилия, прибирала бы за мной, я замусорил бы  любую квартиру до предела.  Как  актёр  Театра  на  Таганке,  Высоцкий  зарабатывал  очень  немного.  В  то  же  время  какието средства к существованию — может быть, и немалые, по советским меркам, — у  него  водились.  Когда  в  СССР  одна  за  другой  стали  появляться  его  пластинки  с  песнями,  дозволенными властями, их начали исполнять ансамбли во всех кабаках от Владивостока  до Риги. К тому же эти вещи передавали и по радио, так что Высоцкий должен был иметь  приличные тантьемы. А ещё и бессчётное количество концертов  — ведь его приглашали  повсюду,  включая  КГБ.  В  конвертах,  которые  вручались  ему  после  концертов,  он  обнаруживал суммы, многократно превышавшие его театральный оклад. Однако всё это в  российских условиях отнюдь не делало его миллионером. Обе его московские квартиры,  которые  я  видел,  по  сравнению  с  жилищами  преуспевающих  советских  артистов  были  скромны и невелики, зато обставлены с большим вкусом.  Концерт на Малой Грузинской состоялся, разумеется, в гостиной. И на этот раз многие  слушатели  включили  магнитофоны.  Высоцкому  это  не  мешало.  Совсем  наоборот.  Он  отдавал себе отчёт в том, что благодаря этому появляются записи, которые кружат затем  по всей стране.  Я Это  не  мы  выдумали  «самиздат».  Русский,  в  особенности  записи  песен  Высоцкого,  был  весьма  специфичен:  «магнитиздат»  доходил  до  чекистов  и  воров,  партийных  чиновников  и  диссидентов,  студентов  и  крестьян,  профессоров  и  солдат.  До  всех,  готов  поклясться.  Чекистам  записи  нравились  до  такой  степени,  что  в  очередную,  кажется,  пятьдесят  пятую  годовщину  образования  ЧК–НКВД–КГБ  они  обратились  к  своему  тогдашнему  руководству  с  просьбой  пригласить  на  торжественное  собрание  Высоцкого.  И,  кстати  сказать,  предложили  ему  огромный  гонорар.  Высоцкий,  ясное  дело,  вызов  принял. Как Адам Михник, он верил, что каждого можно изменить.  Я тоже хотел бы верить.  На магнитофонной записи этого концерта я слышал овации.  Песни  Высоцкого  достигали  всех  уголков  этой  огромной  страны  именно  благодаря  несовершенным  записям  с  частных  квартир,  с  концертов,  которые  он  давал  в  самых  неожиданных  местах:  в  самолётах,  в  тайге,  в  геологических  партиях.  К  сожалению,  чрезвычайно  редко,  а  лучше  сказать  —  несоизмеримо  редко,  Володя  записывался  официально, в условиях, которых заслуживал.  А как он пел! Когда Володя брал гитару в руки, то этот невысокий мужчина, обычно  довольно кроткий и тихий, вдруг преображался в какуюто взрывчатую смесь. Натянутая  струна,  тетива  лука,  исступление  до  границ  безумства,  смерти.  И  этот  голос!..  Казалось,  что  вотвот  лопнут  его  голосовые  связки,  а  у  нас  барабанные  перепонки,  что  гитара  воспламенится  в  его  ладонях…  Когда  он  доходил  до  фортиссимо,  никто  не  мог  устоять  перед  магической  мощью  его  исполнения.  Никто,  даже  те,  кто  понимал  только  по китайски.  Во  всяком  случае,  я  не  встречал  исполнителя,  который  мог  бы  так  подчинить  себе публику.        ыть может, были поэты и крупнее его, даже в его стране. При жизни Володи его  поэзия  поразному  оценивалась  в  интеллектуальных  кругах  Москвы  или  Ленинграда.  С  течением  времени  она  ценилась  всё  выше.  Сейчас  её  читают,  раньше  только  слушали,  и  она  казалась  неотделимой  от  голоса  Высоцкого.  Сейчас  я  наконец  понимаю,  почему  эта  поэзия  стала  голосом  поколения,  нет,  нескольких  поколений.  Для  ветеранов  Отечественной  войны  он  был  одним  из  них,  для  лётчиков  был  коллегой,  он  совершал  восхождения  с  альпинистами,  моряки  с  подводной  лодки,  которой  грозила  авария, слушали его песни…  В  Советском  Союзе  существует  звание  «Народный  артист».  На  афишах  его  печатают  всегда  с  большой  буквы  рядом  с  фамилией.  С  этим  званием  связаны,  должно  быть,  большое профессиональное мастерство, любовь зрителя (ни одна публика в мире так не  любит своих артистов, как русская), определённые материальные привилегии: квартиры,  дачи, ставки, гастроли и т. д. Высоцкий никогда не был произведён в Народные артисты.  Это ясно и понятно. Но и он и народ знали, кто настоящий артист. Официально это было  подтверждено тишь после его смерти, то есть, простите, после смерти Брежнева.  Что  касается  актёров,  то  можно  было  бы  немало  найти  столь  же  хороших,  как  он,  а  может,  и  лучше  —  не  так  много  он  в  конечном  счёте  сыграл.  Особенно  в  кино  —  ему  никогда не было позволено сыграть положительного героя. Ему поручались роли чекистов  и  милиционеров  —  вероятно,  для  того,  чтобы  размыть  смысл  его  бунтарских  песен,  высмеять  их.  В  отличие  от  меня,  ему  не  выпало  счастья  играть  в  экранизациях  лучших  книг, написанных на его языке.  Ты  помнишь,  Маринка,  мы  всегда  мечтали  сыграть  вместе,  втроём,  в  какомнибудь  хорошем фильме. Эта радость выпала уже только тебе и мне. Но Володя был там с нами.  Это  был  фильм  западногерманского  телевидения,  поставленный  в  1983  по  пьесе  Эрдмана  «Самоубийца».  Режиссёром  был  тоже  один  из  нас,  чех  Войтек  Ясный,  учитель  Милоша  Формана,  политический  эмигрант  после  нашей  омерзительной  интервенции  в 1968. Он приехал в Париж, где я тогда жил, и сказал: «Прочти — вот лучшая комедия о  том,  что  мы  пережили».  Я  прочитал,  а  потом  вспомнил,  что  этот  трагифарс  уже  репетировался  в  Польше,  в  театре  «Атенеум»  в  Варшаве.  Репетиции  были  прекращены  13 декабря 1981 года.  Хотя  бы  для  того,  чтобы  состоялась  мировая  премьера  этой  пьесы,  я  подписал  контракт.  Ясный  и  его  продюсер  попросили  меня  уговорить  какуюнибудь  французскую  звезду тоже сыграть в этом фильме. По многим причинам я не мог тогда не вспомнить о  тебе.  Лишь на съёмках я узнал, что эту пьесу он читал тебе вслух в оригинале, порусски. Он  дружил с Эрдманом и мечтал сыграть в ней.  Во  время  работы  над  фильмом  меня  преследовало  несколько  комплексов.  Во первых, я чувствовал, что при всей симпатии ко мне и моей работе ты приглядываешься  ко мне с отчуждением, думая о том, как бы мог это сыграть Володя. Вовторых, порусски  Б текст  звучал  куда  смешнее  и  умнее.  А  втретьих,  фильмы,  основанные  на  театральных  пьесах, удаются необычайно редко. Так было и на сей раз. Но что мы пережили вместе, то  мы пережили.  Высоцкий  всегда  пользовался  удивительно  экономными  средствами  выразительности,  производя,  несмотря  на  это,  а  может  быть,  благодаря  этому,  колоссальное впечатление на зрителей. Чувствовалось, что это необыкновенная личность;

  поэтический гений какимто таинственным образом дополнялся у него исполнительским  мастерством.  Высоцкий  словно  рвал  свои  песни  из  жил  и  нервов,  пел  всем  своим  существом, всем телом. Каждый концерт был для него огромным физическим усилием.  Его  исполнение,  как  водяной  знак  на  ценных  бумагах,  нельзя  подделать,  оно  единственно  в  своём  роде.  Я  не  позволю  уговорить  себя  исполнять  его  песни.  Я  был  слишком близок с Володей, слишком близок с его песнями, я видел, как они создавались.  Я не осмелился бы петь его песни иначе и не хочу неуклюже имитировать Высоцкого. Мои  коллеги, тысячи других поют эти песни, и я ничего не имею против. Но не ждите от меня  того же.  Иногда мы пели вместе, просто так, для удовольствия, зачастую балуясь при этом. Я  делал  это  немного  «под  него».  Хорошо,  что  нет  магнитофонных  записей  нашего  пения;

  такое не для продажи. Публично я бы не осмелился изображать Высоцкого.  Столь сильно натянутая струна дрожала только в его исполнении. Такова привилегия  самых выдающихся артистов: их судьба, счастье, и, быть может, проклятье, которым они  расплачиваются за самую большую любовь.  Когда  Володя  пел  драматические  песни,  он  был  сконцентрирован  на  гитаре.  Склонённая  голова,  взгляд,  прикованный  к  инструменту.  Только  порой  он  бросал  короткие  взгляды  прямо  перед  собой,  чуть вверх,  отводя  глаза  от  слушателей.  Во  время  концертов  —  как  правило,  многочасовых  —  Володя  был  сосредоточен  на  том,  чтобы  сохранить  феноменальную  гармонию  между  диафрагмой,  горлом,  руками  и  струнами  гитары. Гитары, которая в его руках становилась чемто необыкновенным и… громким.  Ты помнишь, Маринка, Володя как раз приехал из Москвы. Был вечер, мы сидели в  твоей маленькой квартире на улице Дюрок. Я попросил его спеть чтонибудь новенькое.  Он  ударил  по  струнам  и  начал.  Это  было  продолжение  «Охоты  на  волков»  —  «Конец  “Охоты на волков” или Охота с вертолётов»:  Словно бритва рассвет полоснул по глазам,  Отворились курки, как волшебный сезам,  Появились стрелки, на помине легки, —  И взлетели стрекозы с протухшей реки,  И потеха пошла — в две руки, в две руки!  Вы легли на живот и убрали клыки.  Даже тот, даже тот, кто нырял под флажки,  Чуял волчие ямы подушками лап;

  Тот, кого даже пуля догнать не могла б, —  Тоже в страхе взопрел и прилёг — и ослаб.  Чтобы жизнь улыбалась волкам — не слыхал,—  Зря мы любим её, однолюбы.  Вот у смерти — красивый широкий оскал  И здоровые, крепкие зубы.  Улыбнёмся же волчьей ухмылкой врагу —  Псам ещё не намылены холки!  Но — на татуированном кровью снегу  Наша роспись: мы больше не волки!  Мы ползли, пособачьи хвосты подобрав,  К небесам удивлённые морды задрав:  Либо с неба возмездье на нас пролилось,  Либо света конец — и в мозгах перекос, —  Только били нас в рост из железных стрекоз.  Кровью вымокли мы под свинцовым дождём —  И смирились, решив: всё равно не уйдём!  Животами горячими плавили снег.  Эту бойню затеял не Бог — человек:  Улетающим — влёт, убегающим — в бег…  Свора псов, ты со стаей моей не вяжись,  В равной сваре — за нами удача.  Волки мы — хороша наша волчая жизнь,  Вы собаки — и смерть вам собачья!  Улыбнёмся же волчьей ухмылкой врагу,  Чтобы в корне пресечь кривотолки.  Но — на татуированном кровью снегу  Наша роспись: мы больше не волки!  К лесу — там хоть немногих из вас сберегу!  К лесу, волки, — труднее убить на бегу!  Уносите же ноги, спасайте щенков!  Я мечусь на глазах полупьяных стрелков  И скликаю заблудшие души волков.  Те, кто жив, затаились на том берегу.  Что могу я один? Ничего не могу!  Отказали глаза, притупилось чутьё…  Где вы, волки, былое лесное зверьё,  Где же ты, желтоглазое племя моё?!  …Я живу, но теперь окружают меня  Звери, волчьих не знавшие кличей, —  Это псы, отдалённая наша родня,  Мы их раньше считали добычей.  Улыбаюсь я волчьей ухмылкой врагу,  Обнажаю гнилые осколки.  Но — на татуированном кровью снегу  Тает роспись: мы больше не волки!  Когда  фортиссимо  в  последнем  куплете  дошло  до  апогея,  стали  стучаться  соседи.  «Пожалуйста,  выключите  эти  ваши  пластинки!»  —  требовали  они.  А  ты  пыталась  объяснить им, что это не проигрыватель, что это — муж, который только что приехал. Будь  они  русскими,  они  бы  повторить  попросили.  А  французы,  эх,  что  говорить…  Трудно  удивляться, что Володя чувствовал: «там» — не его место. А где оно было?  Едва он возвращался «сюда», на родину, его тут же злило всё, что он видел вокруг. Но  это была ярость, из которой нечто рождалось. Он касался своей прекрасной и страшной  земли,  как  Илья  Муромец,  и  набирался  сил  —  чтобы  творить  свои  самые  великолепные  песни.   вот,  обруганные  соседями,  мы  вышли  на  улицы  Парижа.  Это  действительно  свободный город свободных людей. Мы уселись под какимто забором и начали  петь. И тогда Зузанна, заливаясь смехом, показала надпись на заборе: “Chantier interdit”1.  Володя  уже  понимал  немного  пофранцузски,  знал,  что  chanter  —  значит  «петь»,  застеснялся  и  замолчал.  Как  водится  у  русских:  запрещено  —  значит  запрещено.  Вероятно, на секунду поверил, что у этого забора французы запрещают петь.  Во  Франции  о  Высоцком  писали  преимущественно  как  о  муже  Марины  Влади,  но  и  как  о  русском  Брассенсе.  Я  не  слышал  от  Володи  никаких  комментариев.  Наверно,  он  ценил  этого  поэта  и  певца,  но,  пожалуй,  выше  ставил  музыкальное  и  исполнительское  мастерство  Шарля  Азнавура.  Забавно.  В  Гданьске,  во  время  съёмок  «Жестяного  барабана», я узнал, что Марина и Володя приехали в Варшаву. Как обычно, они мчались  из Москвы в Париж или наоборот, уже не помню. Я не мог лично встретить своих друзей.  В нашей маленькой квартирке на Инфлянтской гостей принимала Зузя. А я в Гданьске как  раз снимался в сценах с участием Азнавура.  Мне  очень  хотелось  представить  друга  французскому  коллеге,  «поделиться»  Высоцким.  Со  многими  я  так  делился,  всегда  слишком  эмоционально,  слишком  щедро.  Чаще всего это происходило с помощью записей Володи. Я пытался по ходу переводить и  —  что  за  кретинизм  —  даже  подпевать  ему.  И  всегда,  всё  равно  кто  —  поляки  ли,  французы, американцы — просили меня перестать. Я включил ему «Две гитары» — позже  Шарль ввёл во Франции в моду этот цыганский шлягер.  Тут  я  должен  похвастать:  есть  и  моя  доля  в  окончательном  звучании  этой  песни.  Володя пел её на какомто приёме, когда я уже так разгулялся, что после очередного «эх,  раз!»  опрокинул  залпом  целый  стакан  водки.  «Да  что  ты!»  —  ввернул,  увидев  это,  Высоцкий, в ритме песни, но нормальным своим голосом. Как оказалось, эту реплику он  включил навсегда в текст песни, считая, что она звучит «очень поцыгански».  Я  внимательно  наблюдал  за  Азнавуром,  слушающим  «Две  гитары».  Этот  невысокий,  очень говорливый мужчина, которого невозможно было прервать, молчал  целых  пять  минут! — столько длится произведение Высоцкого. Потом он встал, попросил ключик от  минибара  (тогда  уже  были  такие  в  гданьских  отелях),  налил  себе  стопку  водки.  Выпил,  попрежнему  молча!  И  ушёл.  Я  проводил  его  до  самого  номера.  Прощаясь,  он  сказал,  выдвигая характерным образом нижнюю челюсть: «Il ne chante pas. Il vomiet. Он не поёт,  он выблёвывает. Лучше, чем я».  Я долго ждал связи с Варшавой. Во втором часу ночи трубку взяла Зузя. Володя уже  спал. Я попросил её передать ему слова Азнавура. До сих пор не знаю, сделала ли она это.  «Человека из  железа»  я  впервые  смотрел  в  Канне.  Это было  меньше,  чем  через  год  после рождения «Солидарности». Анджей сделал этот фильм, как известно, очень быстро.  Марина  сидела  рядом  со  мной.  Когда  в  последних  эпизодах  фильма  Кристина  Янда  запела с такой же экспрессией, как Володя, Марина зарыдала. А через мгновенье сказала:  «Господи, и Володя этого не дождался, не видит, что в Польше делается».                                                          И  Игра слов: Chantier interdit/Chanter interdit — Строить запрещено/Петь запрещено.  Но  в  какомто  смысле  он  был  с  нами,  он  принимал  участие  в  тех  необыкновенных  событиях.  В  1981 году  я  участвовал  в  Фестивале  запрещённой  песни.  Может  быть,  и  потому, что не забыл слова, которые шепнула мне Марина в тёмном кинозале.  Фестиваль  в  большом  зале  «Оливии»  организовала  гданьская  «Солидарность».  Съехались барды со всей Польши. Среди них: Яцек Качмарский, Анджей Гарчарек, Мачей  Зембатый  и  многие  другие.  Мне  поручили  вести  это  мероприятие,  а  также  объявить  результаты  конкурса.  Больше  всего  мне  понравилась  песня  Качмарского,  но  победила  другая  —  невысокой  пробы,  обращённая  к  самым  примитивным  политическим  инстинктам: «…и по жопе, нависшей над Польшей, дать пинка, какой бы красной она ни  была…».  Вердикт,  несмотря  на  всю  его  несуразность,  был  всё  же  понятен,  ибо  это  был  период усилившихся антисоветских настроений. Я вышел и сказал:  —  Господа! Поскольку в этом зале царит полная демократия, я, ваш конферансье, не  обязан соглашаться с гласом народа. Лично мне больше всего понравилась другая песня,  не скажу, какая, — тут часть публики одарила меня аплодисментами, выражая согласие.  — Вердикт уже вынесен, продолжал я, — но я не могу под конец фестиваля не поделиться  с  вами  своими  размышлениями.  Несомненно,  эти  великолепные  —  во  всяком  случае,  некоторые  —  поэты,  барды,  поющие  под  гитару  свои  стихи,  вполне  оригинальны.  Но  их  литературная  и  эмоциональная  родословная  ведётся  от  знаменитых  русских  певцов  и  поэтов.  Прежде  всего  от  Булата  Окуджавы,  а  последнее  время  —  от  Владимира  Высоцкого,  который  становится  всё  более  известен  в  Польше.  К  сожалению,  он  уже  год  как  умер.  Думаю,  если  бы  он  был  жив  и  если  бы  получил  визу  в  Польшу,  в  чём  я  не  слишком  уверен,  то  его  выступление  достойно  увенчало  бы  этот  фестиваль.  Он  умер,  проблем с визой больше нет. Так дадим ему духовную визу! Я хотел бы закончить нашу  встречу песней в его исполнении…  По  моей  просьбе  в  зале  выключили  свет.  В  темноте  одинединственный  прожектор  осветил  одинокий  микрофон.  И  раздалась  знаменитая  «Охота  на  волков».  Перед  этим  я  коротко рассказал, о чём эта песня: облава, поля окружены флажками, ведь известно —  под красной тряпицей волк не пройдёт. Идёт охота. Стая врассыпную. Идёт охота, падают  волки.  Только  одному  удаётся  уйти  живым,  но  ясно,  что  он  вернётся,  ибо  гдето  там,  в  снегу, остались его братья…  Я не был уверен в реакции зала. Пять тысяч человек — это толпа, и совсем нелегко её  направить. Даже самый популярный конферансье может столкнуться с трудностями, ведь  это  действительно  искусство  —  овладеть  столь  разболтанной  публикой,  а  тем  более  предложить  ей  чтолибо  против  её  воли.  И  всё  же  наступила  тишина.  Володя  пел,  а  я  смотрел, как все медленномедленно встают с мест. Вот так Владимир Высоцкий принял  участие в нашем празднике.  есколько  лет  назад,  когда  перестройка  ещё  никому  не  снилась,  а  те,  кому  снилась, сидели в тюрьмах, итальянский режиссёр Мауро Болоньини предложил  мне  роль  в  фильме  об  Иде  Нудель,  русской  диссидентке  еврейского  происхождения.  Её  играла Лив Улльман. А я был её киномужемпоэтом. В одном из интервью я тогда сказал:  «Мы делаем этот фильм как бы вместо других, куда лучше его сделали бы сами русские.  Им  принадлежит  право  на  эту  тему.  И  обязанность  её  воплотить.  К  сожалению,  в  нынешней ситуации необходимо, чтобы мы сделали это вместо них. Искусство не может  молчать об этом. Пока русские не могут говорить о себе собственным голосом, но когда нибудь наверняка всё изменится». Словом, я как будто предчувствовал то, что произошло  позже.  Я  не  представлял  себе,  чтобы  в  фильме,  который  должен  воссоздать  интеллектуальную и эмоциональную атмосферу диссидентских кругов в России, могло не  Н оказаться  одного  из  духовных  столпов  этого  общества.  Звучание  песен  Высоцкого  казалось  мне  абсолютно  необходимым.  Я  предложил  это  режиссёру,  а  он  придумал  сцену, в которой я прощу Лив, мою «жену», послушать, что о людях в нашем положении  поёт Высоцкий. Кстати, его имя в этой сцене не называлось.  Начали  репетировать,  я  включил  магнитофон.  И,  должен  признаться,  Лив  Улльман  разочаровала  меня  тогда.  Разочаровала  как  актриса,  как  профессионал.  Она  сыграла  в  этой сцене «взволнованность вообще», то есть то, что ничего не означает. В актёрстве не  бывает  игры  «вообще».  Есть  ответ  на  конкретную  эмоцию,  слово,  событие.  По  мысли  сценариста,  песня  Высоцкого  должна  была  вызвать  именно  такую  реакцию,  определённое  напряжение.  Между  тем,  Лив  не  прореагировала  и  некоторым  образом  испортила  замысел.  Она  вообще  этим  не  заинтересовалась!  В  противоположность  всей  группе,  которая  сгрудилась  у  магнитофона,  привлечённая  голосом  и  экспрессией.  В  перерыве мне пришлось долго объяснять, о чём поёт Высоцкий, — это было «Горное эхо»  —  и  кто  он  вообще  такой.  Смотрите,  как  это  действует!  Снова  —  натянутая  струна.  Международная  группа,  порусски  ни  в  зуб,  а  всётаки  чтото  их  привлекло,  притянуло  к  магнитофону.  Именно  чтото.  Чтото,  чего  ни  они,  ни,  пожалуй,  я  сам  до  конца  не  понимаем.  Лив  отнеслась  ко  всему  этому  достаточно  легкомысленно.  В  перерыве  между  съёмками она внимательно слушала плейер. Я спросил:  —  Что ты так слушаешь?  Лив сняла наушники, взволнованно ответила:  —  Рахманинова…  Она  явно  хотела  наполниться  русской  культурой,  чтобы  с  этаким  пафосом  девятнадцатого столетия войти в роль, воплотиться в свою героиню, но выбрала источник  для  Анны  Карениной,  а  не  для  Иды  Нудель.  Просто  перепутала  краны.  И  увы,  сыграла  русскую  диссидентку  несколько  неадекватными  средствами  выражения.  Сделала  это  великолепно,  как  великая  актриса,  но  по  фальшивым  рецептам.  Играла  хорошо,  только  это было не то — полное недоразумение. Я знаю что говорю, я ведь немножко знаком с  этими  русскими  диссидентами,  в  том  числе  и  еврейского  происхождения,  с  их  неповторимым чувством юмора.  Лив  в  своей  уборной  слушала  Рахманинова,  попивая  сок,  а  я  с  группой,  попивая  граппу,  слушал  Высоцкого.  Выпивая,  его  слушать  лучше  всего.  Я  включал  им  другие  записи, переводил тексты. Они были взволнованы. Лив этого просто не почувствовала.  Не скрою, я был на неё очень зол. Прошло несколько дней, вижу — Лив читает какое то интервью в израильской газете. Именно с Идой Нудель! Возбуждённая, она обратилась  ко мне:  —  Даниэль, ты знаешь такого поэта… Владимир Висотски?  —  Да, — говорю, — а что?  —  А  то,  что  моя  героиня  утверждает,  что  это  её  любимый  поэт,  и  благодаря  его  песням они выдержали эти годы жизни в неволе. Я должна с ним познакомиться.  —  Лив,  —  говорю  я,  —  три  дня  назад  ты  слышала  его  голос  на  плёнке.  И  даже  не  спросила меня, ни кто это такой, ни о чём он поёт.  —  А «Охоту на волков» знаешь?  —  Знаю. Пока ты слушала своего Рахманинова, мы как раз слушали эту песню.  Я произнёс это столь холодно и язвительно, что Лив восприняла мои слова как упрёк.  Она очень умна и впечатлительна, но Высоцкий прошел мимо неё. А ведь работа актёра  состоит не в создании фикции, а в воссоздании правды. Лив допустила профессиональную  ошибку.  Влияние  поэзии  Высоцкого  на  жизнь  реальной  Иды  Нудель  было  столь  велико,  что, не зная об этом, нельзя было познать правду этой женщины.  Пусть Лив простит мне этот рассказ. Он ни в чём не может принизить её талант. Это  только шутливая критика её претензии быть специалисткой по России. Просто она спутала  Россию с отелем «Россия».    ысоцкий  обладал  неправдоподобным  комическим  даром.  Это  особенно  потрясает  в  сопоставлении  с  его  серьёзными,  трагическими  песнями,  которые  известны,  пожалуй,  больше.  Комические  песни  он  пел  совершенно  иначе,  меняясь:  он  чуть опирал голову, поднимал бровь, округлял глаза. Применяя минимум выразительных  средств, он в мгновение ока становился чертовски забавным.

 Чаще всего он пел от имени  своих  земляков:  наивных,  чуть  смешных,  чуть  жалких  людей.  Там  все  либо  смешны  и  одновременно  трагичны,  либо  жалки  и  величественны,  горделивы  без  гордыни  или  же  безмерно спесивы. Володя осознавал это, и потому в его песнях сосуществуют ирония и  снисходительность.  Все  мы,  наверно,  эти  смешные  песенки  хоть  раз  да  слышали.  Чаще  всего  это  были  плёнки, записанные на домашних концертах. На многих залпы громкого смеха заглушают  исполнителя.  Текст  не  слышен,  поскольку  слушатели  хохочут,  корчатся  от  смеха.  Таких  плёнок  ходит  по  Польше  много,  я  знаю  совершенно  точно,  ибо  несколько  из  них  принадлежало некогда мне.  В  памяти  особенно  запечатлелись  мгновения,  когда  Володя  пел  в  моём  доме  эти  «частные» песенки. Он очень любил моего сына Рафала, который, кстати, посвоему ему  подражал.  Рафалу  было  пять  лет,  и  он  пел,  подражая  жестам  и  мимике  Высоцкого,  на  какомто странном, выдуманном им самим языке. Растроганный этим Высоцкий написал,  как  утверждал,  —  для  Рафала,  песенку  о  мальчике,  который  играет  в  солдатики:  «Пятилетний  Наполеон».  Получилась  длинная  баллада  «Оловянные  солдатики»,  не  совсем о Рафале (отчего изменилось и название), полная метафор, которые до конца мне  не удалось расшифровать, поскольку очень быстро эту кассету ктото увёл.  В этой книжечке из всего наследия Высоцкого я выбираю только тексты, с которыми  связано какоенибудь происшествие, личное воспоминание. И прошу этот особый выбор  мне простить.  Будут и стихи и математика,  Почести, долги, неравный бой, —  Нынче ж оловянные солдатики  Здесь, на старой карте, встали в строй.  Лучше бы уж он держал в казарме их,  Только — на войне как на войне —  В Падают бойцы в обеих армиях,  Поровну на каждой стороне.  Может быть — пробелы в воспитании  И в образованье слабина, —  Но не может выиграть кампании  Та или другая сторона.  Совести проблемы окаянные —  Как перед собой не согрешить?  Тут и там — солдаты оловянные, —  Как решить, кто должен победить?  И какая, к дьяволу, стратегия,  И какая тактика, к чертям!  Вот сдалась нейтральная Норвегия  Ордам оловянных египтян.  Левою рукою Скандинавия  Лишена престижа своего,  Но рука решительная правая  Вмиг восстановила статускво.  Где вы, легкомысленные гении,  Или вам являться недосуг?  Где вы, проигравшие сражения  Просто, не испытывая мук?  Или вы, несущие в венце зарю  Битв, побед, триумфов и могил,  Где вы, уподобленные Цезарю,  Что пришёл, увидел, победил?  Сколько б ни предпринимали армии  Контратак, прорывов и бросков,  Всё равно на каждом полушарии  Поровну игрушечных бойцов.  Нервничает полководец маленький,  Непосильной ношей отягчён,  Вышедший в громадные начальники  Шестилетний мой Наполеон.  Чтобы прекратить его мучения,  Ровно половину тех солдат  Я покрасил синим — шутка гения, —  Утром вижу — синие лежат.  Я горжусь успехами такими, но  Мысль одна с тех пор меня гнетёт:  Как решил он, чтоб погибли именно  Синие, а не наоборот?..  Володю  никогда  не  волновало  то,  что  во  всём  мире  почиталось  занятием  противозаконным: тиражирование и распространение произведений без согласия автора.  Он не реагировал и тогда, когда в среднеазиатских республиках, где рынок, захваченный  мафией,  является  серьёзным  экономическим  фактором,  начали  попиратски  выпускать  его пластинки! Он знал, что как певец существует на самом деле именно благодаря этому.  Ведь  во  всей  огромной  России,  кроме,  пожалуй,  Москвы,  мало  кто  знал  тогда,  как  он  выглядит и сколько ему лет. А сегодня его фотографии продают на Ваганьковском. Может,  и  мне  не  стоит  сожалеть,  что  плёнки  мои  пошли  по  рукам.  Ничего  не  попишешь,  Бог  с  ними — ктото ведь их слушает.  Но  одной  кассеты,  которая  пропала,  как  многие  другие,  мне  всётаки  жаль.  На  ней  была  песня,  которую  я  никогда  больше  не  слышал.  Возможно,  это  было  единственное  исполнение…  Володя  назвал  ее:  «Песня  для  нашего  будущего  фильма  “Бывшие  лётчики”». В фильме, сценарий которого Высоцкий написал вместе со своим приятелем,  мы должны были играть вместе. Мы мечтали об этом. Третья роль предназначалась для  приятеля Марины, а потом и нашего общего, замечательного французского актёра, ныне  суперзвезды, Жерара Депардье. Должно было быть, как в анекдотах: русский, француз и  поляк…  История, в общих чертах, такая: в немецком лагере для военнопленных, среди других  узников,  сидят  трое  лётчиков  —  русский  Володя,  поляк  Даниэль  и  француз  Жерар.  Они  становятся  друзьями.  Приближается  освобождение,  победа  союзников  и  Сталина.  Французу  абсолютно  безразлично,  кто  освободит  лагерь,  —  он  хочет  только  спокойно  этого дождаться. Поляк же, а особенно русский, не слишком уверены в своей судьбе, если  их  освободит  Красная  Армия.  Они  решают  бежать  раньше.  И  бегут.  Друг  француз,  разумеется,  с  ними.  Далее  шёл  каскад  их  невероятных  приключений  в  освобождённой  Европе. Это было смешно, патетично и трагично. Увы, славянская ностальгия дала о себе  знать:  русский  решает  непременно  вернуться  в  лоно  «матушки  России».  Поляка  тоже  снедает тоска.  И  как  тут  вернуться?  Ну,  как  же,  кратчайшим  путём  —  самолётом.  Известное  дело,  лётчики.  Где  взять  самолёт?  Проще  всего  позаимствовать  на  американской  базе.  Француза  не  интересует  полёт  на  восток.  Тем  не  менее  он  соглашается  помочь,  отвлечь  внимание охраны аэродрома и захватить башню контроля за полётами, как в фильмах с  Джеймсом Бондом. Что и совершает, ясное дело, погибнув при этом. А двое поднялись в  воздух. Им не хватило горючего, и они приземлились на картофельном поле недалеко от  Лодзи.  Тем  самым  оказали  неоценимую  услугу  советской  разведке,  приведя  в  её  руки  новейшую  модель  американского  реактивного  самолёта.  Судьба  русского  пилота  была  предрешена,  как  судьбы  большинства  советских  военнопленных,  которым  удавалось  вернуться. Польский пилот в то время, когда Высоцкий рассказывал мне эту историю, по  слухам, был ещё жив. История была подлинной.  Фильм не был снят;

 жаль, но ничего не вышло из наших планов. При жизни Брежнева  это  было  малореально,  после  смерти  Володи  стало  невозможно.  Уцелела  «Песня  о  погибшем лётчике».  Всю войну под завязку  я всё к дому тянулся,  И хотя горячился —  воевал делово, —  Ну а он торопился,  както раз не пригнулся —  И в войне взадвперёд обернулся  за два года — всего ничего.  Не слыхать его пульса  С сорок третьей весны, —  Ну а я окунулся  В довоенные сны.  И гляжу я дурея,  И дышу тяжело:  Он был лучше, добрее,  Добрее, добрее, —  Ну а мне — повезло.  Я за пазухой не жил,  не пил с Господом чая,  Я ни в тыл не просился,  ни судьбе под подол, —  Но мне женщины молча  намекали, встречая:  Если б ты там навеки остался —  может, мой бы обратно пришёл?!  Для меня — не загадка  Их печальный вопрос, —  Мне ведь тоже несладко,  Что у них не сбылось.  Мне ответ подвернулся:  «Извините, что цел!  Я случайно вернулся,  Вернулся, вернулся, —  Ну а ваш — не сумел».  Он кричал напоследок,  в самолёте сгорая:  «Ты живи! Ты дотянешь!» —  доносилось сквозь гул.  Мы летали под Богом  возле самого рая, —  Он поднялся чуть выше и сел там,  ну а я — до земли дотянул.  Встретил лётчика сухо  Райский аэродром.  Он садился на брюхо,  Но не ползал на нём.  Он уснул — не проснулся,  Он запел — не допел.  Так что я вот вернулся,  Глядите — вернулся —  Ну а он — не успел.  Я кругом и навечно  виноват перед теми,  С кем сегодня встречаться  я почёл бы за честь,  Но хотя мы живыми  до конца долетели  Жжёт нас память и мучает совесть,  у того, у кого она есть.  Ктото скупо и чётко  Отсчитал нам часы  Нашей жизни короткой,  Как бетон полосы, —  И на ней — кто разбился,  Кто взлетел навсегда…  Ну а я приземлился,  А я приземлился, —  Вот какая беда…  ас  связывала  также  страсть  к  лошадям  и  автомобилям.  Свою  первую  машину  (подержанный «мерседес») Володя купил поздно, ещё позднее научился водить.  Когда же он овладел этим искусством, стал ездить быстро и уверенно. Даже ребёнок не  радуется  так  электрической  железной  дороге,  как  он  радовался  автомашине.  Ничего  удивительного,  что  этой  своей  страсти  он  посвятил  несколько  песен.  Одну  из  первых  он  написал,  очевидно,  после  того,  как  я  прокатил  его  в  машине  по  заснеженной  Москве.  Я  щеголял разного рода трюками и штучками. Машина была в порядке, учил меня Собеслав  Засада,  и  потому  ничего  ни  с  кем  не  случилось,  но  когда  я  остановился,  Володя  вышел,  поцеловал землю и сказал: «А сейчас я тебе спою насчёт этого». В тот день я впервые  услышал «Горизонт».  Чтоб не было следов, повсюду подмели…  Ругайте же меня, позорьте и трезвоньте:  Мой финиш — горизонт, а лента — край земли, —  Я должен первым быть на горизонте!  Условия пари одобрили не все —  И руки разбивали неохотно.  Условье таково: чтоб ехать — по шоссе,  И только по шоссе — бесповоротно.  Наматываю мили на кардан  И еду параллельно проводам, —  Но то и дело тень перед мотором —  То чёрный кот, то ктото в чёмто чёрном.  Я знаю — мне не раз в колёса палки ткнут.  Н Догадываюсь, в чём и как меня обманут.  Я знаю, где мой бег с ухмылкой пресекут  И где через дорогу трос натянут.  Но стрелки я топлю — на этих скоростях  Песчинка обретает силу пули, —  И я сжимаю руль до судорог в кистях —  Успеть, пока болты не затянули!  Наматываю мили на кардан  И еду вертикально к проводам, —  Завинчивают гайки, — побыстрее! —  Не то поднимут трос как раз где шея.  И плавится асфальт, протекторы кипят,  Под ложечкой сосёт от близости развязки.  Я голой грудью рву натянутый канат, —  Я жив — снимите чёрные повязки!  Кто вынудил меня на жёсткое пари —  Нечистоплотны в споре и расчётах.  Азарт меня пьянит, но, как ни говори,  Я торможу на скользких поворотах.  Наматываю мили на кардан  Назло канатам, тросам, проводам, —  Вы только проигравших урезоньте,  Когда я появлюсь на горизонте!  Мой финиш — горизонт — попрежнему далёк,  Я ленту не порвал, но я покончил с тросом, —  Канат не пересёк мой шейный позвонок,  Но из кустов стреляют по колёсам.  Меня ведь не рубли на гонку завели, —  Меня просили: «Миг не проворонь ты —  Узнай, а есть предел — там, на краю земли,  И — можно ли раздвинуть горизонты?»  Наматываю мили на кардан  И пулю в скат влепить себе не дам.  Но тормоза отказывают, — кода! —  Я горизонт промахиваю с хода!  Володя любил эту песню и часто пел её в моём присутствии. Он написал её, ещё не  имея водительских прав.  Верхом мы никогда вместе не ездили  — не было времени. Он видел мою верховую  езду на экране, а я о его любви к лошадям мог судить по песням, и этого было достаточно,  мы понимали друг друга.  Знатоки  творчества  Высоцкого,  поклонники  и  коллекционеры,  делят  его  баллады  на  разные жанры: трагические и сатирические, комические и лирические, такие и сякие. Мне  кажется,  все  эти  деления  не  имеют  смысла,  а  уж  особенно  выделение  так  называемых  политических  произведений.  В  сущности,  все  песни  Володи  в  какомто  смысле  имеют  характер  политический,  ибо  в  странах,  лишённых  свободы  слова,  каждая  метафора,  каждое сравнение и шутка — как в старом анекдоте — «ассоциируются» с политикой.  Не  нужно  было  знать  Высоцкого  лично,  чтобы  понять,  что  он  думает  о  мире,  в  котором мы жили. Достаточно было вслушаться в его песни. И незачем — хотя это наша  национальная  черта  —  разговаривать;

  так  вот  —  я  никогда  не  говорил  с  Володей  о  политике.  Так  уж  бывает:  люди  с  одинаковыми  взглядами  не  дискутируют.  Такие  разговоры и не вдохновляют, и не обогащают. Лишь сталкиваясь с тем, кто мыслит иначе,  мы  вынуждены  размышлять,  искать  всё  новые  аргументы,  предпринимать  усилия  в  полемике.  Вот  это  я  люблю,  могу  целыми  ночами  препираться,  и  это  раздражает  моих  близких, особенно женщин. Я воспламеняюсь, как артист на сцене, ведь мне кажется, что  я  утверждаю  фундаментальные  ценности  культуры,  а  как  человек  —  отрицаю  откровенное зло, цинизм, удобный рационализм и так называемую честную глупость.  Я сам себе находил противников — начиная с гебистов и кончая некоторыми членами  моей обширной семьи. Иные меня даже обогатили, с другими я попусту тратил время. Во  всяком случае, эти тренировки мне пригодились, особенно во время нескольких допросов  и в моменты чиновничьешантажистского прессинга.  Мне  не  случалось  видеть  Володю  в  таких  ситуациях.  Мы  всегда  встречались  в  кругу  ближайших  друзей.  Но  его  необыкновенную вспыльчивость  я  прекрасно  понимал.  Всем,  что  дал  ему  Господь,  он  стрелял  в  одного  врага  —  в  Зло.  И  в  Глупость.  Как  все  великие  артисты. За это их  — раньше или позже  — любят миллионы. Все.  Или  почти  все. Только  где  же  остальные,  те,  что  мучают  этих  всех?  Их,  должно  быть,  немало.  Ведь,  говоря  серьёзно, Гитлер с Геббельсом или Сталин с Берией физически не смогли бы уничтожить  узников  хотя  бы  одного  концлагеря.  Ктото  же  там,  на  западе  и  востоке,  должен  был  помогать миллионам их преступлений! На одного или двоих Володя бы так, до хрипоты,  не кричал.  осле  Володи  у  меня  остались  в  основном  воспоминания,  и  этого  никто  не  отнимет,  в  отличие  от  кассет.  Больше  всего  жалею  об  одной  —  подарке  с  московских  поминок  —  с  записью  единственного,  кажется,  телевизионного  выступления  Володи,  примерно  за  полгода  до  смерти.  Первый  раз  позволили  ему,  а  точнее  —  его  песням,  войти  в  телевизионную  студию.  Это  было  бы  невозможно  без  настойчивости  друзей. Они знали, что он болен, чувствовали, что он может неожиданно уйти. Осознали,  что следует поторопиться и немедленно, сейчас, запечатлеть всё, что только удастся. Это  было вовсе не так легко. Получить разрешение на телевизионную запись песен Высоцкого  в  его  собственном,  авторском  исполнении  в  ту  эпоху  значило  почти  одержать  политическую  победу.  Друзья  Володи  прибегли  к  следующему  фортелю:  убедили  кого  следует,  что  в  передаче,  посвящённой  кинематографии,  Высоцкий  расскажет  о  песнях,  которые  написал  к  разным  фильмам.  То  есть  представит  те  произведения,  что  уже  пробились сквозь цензуру, существовали в официальном обороте.  Володя  спел  несколько  песен.  Программа  больше  напоминала  репетицию,  чем  сольный  концерт.  Во  время  исполнения  одной  из  вещей  он  несколько  раз  сбивался,  начинал  сызнова.  Волнение  сжимало  горло,  когда  мы  видели,  как  он  атакует  собственную песню, которую исполнял уже сотни раз, которую все, кажется, уже знали на  память.  И  в  этом  был  весь  он.  Он  всегда ставил  себе  высокие  требования.  Помню  такой  момент:  Володя  поёт  «От  границы  мы  землю…».  В  одном  из  куплетов,  а  их  в  этой  балладе  много,  он  сбивается.  Сбивается  раз,  другой,  третий…  и  каждый  раз  на  том  же  П самом  месте.  Начинает  чертыхаться,  а  камера  всё  это  снимает.  Он  впадает  в  ярость  и  наконец без запинки пролетает, как молния, до конца песни. И поёт фантастически!  В студии он был один, говорил не только об отдельных произведениях, но и о том, как  и  почему  пишет,  каким  образом  выбирает  темы,  мотивы.  Чувствовалось,  что  ему  это  безумно  важно,  видно  было,  как  он  старается,  чтобы  программа  снискала  благосклонность  чиновников.  Однако  время  от  времени  чтото  проскальзывало,  и  тогда  из  режиссёрской  кабины  раздавалось  категорическое  «стоп!».  В  окончательной  версии  видны  отчётливые  следы  ножниц.  Я  знаю,  его  инструктировали  во  время  записи,  подсказывали, что можно, а что нет… Володя спокойно принимал замечания, он же знал  —  где  живёт.  Слушал  этих  людей  и  только  смотрел  вверх,  исподлобья,  меняя,  смягчая,  подвергая цензуре себя самого.  И в нашей стране было такое время — я говорю это, думая о самых молодых, — когда  артисты  для  того,  чтобы  существовать,  были  вынуждены  и  даже  хотели  цензурировать  самих  себя.  Мы  обрели  в  этом  такую  сноровку,  что  эзопов  язык,  которым  мы  пользовались,  лучше  доходил  до  зрителя,  чем  голая  правда  до  свободных  людей  в  свободных странах. Говоря только правду, хотя и не всю правду, мы с публикой понимали  друг друга так хорошо, что я пожелал бы себе, чтобы и сегодня так было.  Кассету  с  телевизионной  программой  Володи  в  первый  раз  я  смотрел  во  время  памятных  поминок  в  Москве.  Я  был  потрясён,  что  такое  вообще  существует,  что  государственное телевидение согласилось зафиксировать выступление Высоцкого. Та же  самая  предусмотрительность,  которая  велела  чиновникам  дать  разрешение  на  запись  программы, не позволила им выразить согласие на её выпуск в эфир. Лишь при Горбачёве  по телевидению показали это выступление. Вскоре фрагменты записи смогли посмотреть  и мы.  Я  получил  эту  кассету  от  володиного  сына.  Он  провожал  меня  вместе  с  Мариной  в  аэропорт, и когда мы прощались, незаметно сунул её мне за пазуху. Провожал меня также  —  а  как  же!  —  некий  господин.  Только  его  присутствию  я  обязан  тем,  что  меня  не  обыскали и не отобрали этот «подрывной материал». Должен признать, что впустив меня  тогда на однуединственную ночь, мне оказали большую любезность… Это же было после  31 августа.  Мы  помним,  какие  настроения  господствовали  тогда  у  соседей,  что  писала  советская пресса, агентство ТАСС и прочие «Руде права».  Привезённую из Москвы кассету я использовал во время поминок по Володе 1 ноября  в варшавской «Старой Проховне». В тот вечер Яцек Качмарский пел свою феноменальную  «Эпитафию  Владимиру  Высоцкому»,  Войцех  Млынарский  представил  свои  первые  переводы  песен  Володи,  Марек  Перепечко  прекрасно  спел  «Песенку  про  прыгуна  в  высоту».  Сценография была очень скромной: одинокая гитара и фото Володи, выхваченное из  темноты лучом света. Володя многие концерты начинал песней «Расстрел горного эха»,  и потому мы тоже начали поминки этим произведением в его собственном исполнении.  В тиши перевала, где скалы ветрам не помеха, помеха,  На кручах таких, на какие никто не проник,  Жилопоживало весёлое горное, горное эхо, —  Оно отзывалось на крик — человеческий крик.  Когда одиночество комом подкатит под горло, под горло  И сдавленный стон еле слышно в обрыв упадёт,  Крик этот о помощи эхо подхватит, подхватит проворно,  Усилит — и бережно в руки своих донесёт.  Должно быть, не люди, напившись дурмана и зелья, и зелья,  Чтоб не был услышан никем громкий топот и храп,  Пришли умертвить, обеззвучить живое, живое ущелье, —  И эхо связали, и в рот ему всунули кляп.  Всю ночь продолжалась кровавая злая потеха, потеха, —  И эхо топтали — но звука никто не слыхал.  К утру расстреляли притихшее горное, горное эхо —  И брызнули слёзы, как камни, из раненых скал!  И брызнули слёзы, как камни, из раненых скал.  И брызнули камни, как слёзы, из раненых скал…  Злодеям  удалось  заковать  и  заточить  в  тюрьму  эхо,  но  им  не  удалось  его  победить.  Точно так же и Володю не победила смерть.  После  «Горного  эха»  я,  переодевшись  в  свой  старый  гамлетовский  костюм,  взял  микрофон и стал лихорадочно произносить последний монолог:  Гораций, я кончаюсь. Сила яда  Глушит меня. Уже меня в живых  Из Англии известья не застанут.  Предсказываю: выбор ваш падёт  На Фортинбраса. За него мой голос.  Скажи ему, как всё произошло  И что к чему. Дальнейшее — молчанье.1                                                               Перевод Б. Пастернака.    Мы  с  Володей  были  коллегами  по  «Гамлету».  Я  играл  принца  датского  в  Национальном театре четыре года. Он на Таганке много больше.  Володя  никогда  не  видел  меня  в  этой  роли;




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